स्पेशल न्यूज़ स्टोरी:- आपदा के दौर में मानसिक स्वास्थ्य की नई रणनीति: शारदा विश्वविद्यालय में ISPN का वैश्विक मंथन, नर्सिंग नेतृत्व पर फोकस
मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी”/ ग्रेटर नोएडा
तेजी से बदलती दुनिया में आपदाएं केवल भौतिक नुकसान तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे लोगों के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ रही हैं। कोविड-19 महामारी, प्राकृतिक आपदाएं, सड़क दुर्घटनाएं, युद्ध जैसे हालात और सामाजिक तनावों ने मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक एजेंडा के केंद्र में ला खड़ा किया है। ऐसे समय में शारदा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में आयोजित इंडियन सोसाइटी ऑफ साइकियाट्रिक नर्सेज (ISPN इंडिया) का 4वां अंतरराष्ट्रीय एवं 25वां वार्षिक सम्मेलन एक दूरदर्शी पहल के रूप में उभरा है।
23 से 25 फरवरी तक चल रहे इस तीन दिवसीय सम्मेलन का मुख्य विषय —
“सेवाओं तक पहुंच: आपदाओं और आपात स्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य – नर्सों को सशक्त बनाना”
— वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के बीच बेहद सामयिक और रणनीतिक माना जा रहा है।
🔷 मानसिक स्वास्थ्य: आपदा प्रबंधन का अनदेखा लेकिन अनिवार्य स्तंभ
परंपरागत रूप से आपदा प्रबंधन में राहत, बचाव और पुनर्वास पर अधिक ध्यान दिया जाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक आघात और भावनात्मक अस्थिरता का प्रभाव कई वर्षों तक बना रहता है।
आपदा के बाद अवसाद, चिंता, पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं।
बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर मानसिक प्रभाव अधिक गहरा होता है।
अग्रिम पंक्ति में कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों को भी ‘सेकेंडरी ट्रॉमा’ का सामना करना पड़ता है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए इस सम्मेलन में मानसिक स्वास्थ्य नर्सों को संकट प्रबंधन की अग्रिम पंक्ति में सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
🔷 नर्सिंग नेतृत्व: ‘केयर गिवर’ से ‘क्राइसिस लीडर’ तक
सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण एंगल यह है कि मानसिक स्वास्थ्य नर्सों को केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका में स्थापित किया जाए।
विशेषज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि—
आपदा के समय नर्सें सबसे पहले मरीजों और पीड़ितों के संपर्क में आती हैं।
वे भावनात्मक समर्थन, काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक प्राथमिक उपचार (Psychological First Aid) प्रदान करने में सक्षम होती हैं।
यदि उन्हें उन्नत प्रशिक्षण, डिजिटल उपकरण और नीति-निर्माण में भागीदारी मिले, तो वे आपदा प्रबंधन की रीढ़ बन सकती हैं।
यह सम्मेलन नर्सिंग पेशे को एक नई पहचान और सशक्त मंच देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

🔷 डिजिटल मेंटल हेल्थ: तकनीक से बढ़ेगी पहुंच
डिजिटल मेंटल हेल्थ मिशन के अनुरूप इस सम्मेलन में टेली-मानस और ऑनलाइन काउंसलिंग प्लेटफॉर्म की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई।
डॉ. जी. बालामुरुगन (टेली मानस, निमहांस) ने बताया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से दूरदराज और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित मानसिक सहायता पहुंचाना संभव हो पाया है।
विशेष सत्रों में चर्चा हुई कि—
मोबाइल आधारित मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं कैसे प्रभावी बन सकती हैं
ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में डिजिटल नर्सिंग नेटवर्क कैसे विकसित किया जाए
आपदा के समय रियल-टाइम मनोवैज्ञानिक सहायता प्रणाली कैसे लागू की जाए
तकनीक और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का यह संयोजन भविष्य के स्वास्थ्य मॉडल की झलक प्रस्तुत करता है।
🔷 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का अनुभव साझा
सम्मेलन में निमहांस, एम्स, आईएचबीएएस और एनएचआरसी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों ने भाग लिया।
डॉ. राधाकृष्णन (निमहांस) ने आपदा के बाद सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य मॉडल पर प्रकाश डाला।
डॉ. राजेश सागर और डॉ. सुजाता सतपथी (एम्स) ने मानसिक रोगों की बढ़ती चुनौतियों और नर्सिंग हस्तक्षेप की भूमिका पर विचार रखे।
डॉ. संध्या गुप्ता (एनएचआरसी) ने मानसिक स्वास्थ्य को मानवाधिकार के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा कि संकट के समय मनोवैज्ञानिक सहायता तक पहुंच भी एक मौलिक आवश्यकता है।
कर्नल केका चटर्जी ने सैन्य अस्पतालों के अनुभव साझा करते हुए बताया कि युद्ध और आपात परिस्थितियों में नर्सिंग स्टाफ की भूमिका कितनी निर्णायक होती है।
🔷 शारदा विश्वविद्यालय: शोध और प्रशिक्षण का केंद्र
शारदा विश्वविद्यालय के प्रो-चांसलर श्री वाई. के. गुप्ता ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में मानसिक स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करेगा।
आईएसपीएन के संरक्षक एवं इंडियन नर्सिंग काउंसिल के अध्यक्ष डॉ. टी. दिलीप कुमार ने इसे एक ऐतिहासिक पहल बताते हुए कहा कि यह सम्मेलन नर्सिंग पेशे को नई दिशा देने वाला साबित होगा।
कार्यक्रम में नर्सिंग स्कूल के डीन प्रोफेसर श्री राजा, डॉ. किरण, फैकल्टी सदस्य, स्टाफ और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
🔷 नीति और भविष्य की दिशा
सम्मेलन के अंत में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि—
मानसिक स्वास्थ्य को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति में और अधिक सशक्त स्थान दिया जाए।
नर्सिंग पाठ्यक्रम में आपदा मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य विषय बनाया जाए।
डिजिटल और सामुदायिक मॉडल के माध्यम से सेवाओं की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित की जाए।

🔷 संवेदनशीलता से सशक्तिकरण तक
शारदा विश्वविद्यालय में आयोजित यह सम्मेलन केवल ज्ञान-विनिमय का मंच नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को आपदा प्रबंधन की मुख्यधारा में लाने का एक सशक्त प्रयास है।
यह आयोजन स्पष्ट संदेश देता है कि भविष्य का स्वास्थ्य मॉडल केवल दवाओं और अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसमें प्रशिक्षित, संवेदनशील और तकनीकी रूप से सशक्त नर्सिंग नेतृत्व की निर्णायक भूमिका होगी।
आपदाओं के इस दौर में यदि समाज को मजबूत बनाना है, तो मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी ही होगी — और इस दिशा में शारदा विश्वविद्यालय का यह वैश्विक मंथन एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।