
15 फ़रवरी 1869 (2 ज़ीक़ादा 1285 हिजरी) का दिन उर्दू अदब की तारीख़ में एक गहरे सोग़ का दिन है। इसी रोज़ दिल्ली की सरज़मीं पर उर्दू-फ़ारसी शायरी के बेमिसाल उस्ताद, मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान उर्फ़ मिर्ज़ा ग़ालिब ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा। सोमवार का दिन था, दोपहर ढलते-ढलते वह शख़्स, जिसने अल्फ़ाज़ को फ़लसफ़ा और दर्द को शायरी का जामा पहनाया, ख़ामोशी में उतर गया।
फ़ारसी से हिंदुस्तानी तक – एक अदबी इंक़लाब
मिर्ज़ा ग़ालिब का सबसे बड़ा कारनामा यह रहा कि उन्होंने फ़ारसी शायरी की बुलंद परंपरा को हिंदुस्तानी ज़बान में नई रवानी और नई गहराई के साथ पेश किया। वे फ़ारसी के भी बड़े शायर थे, लेकिन उर्दू ग़ज़ल को जो बौद्धिक ऊँचाई और फ़लसफ़ाना रंग उन्होंने दिया, वह उन्हें अपने दौर से आगे खड़ा करता है।
उनकी शायरी में इश्क़ है, फ़लसफ़ा है, तंज़ है, रूहानी बेचैनी है और इंसानी कमजोरी का ईमानदार इकरार भी। ग़ालिब के यहाँ मोहब्बत सिर्फ़ हुस्न की परस्तिश नहीं, बल्कि वजूद की तलाश है।
1850 में आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने उनकी अदबी ख़िदमतों के एतराफ़ में उन्हें “दबीर-उल-मुल्क” और “नज़्म-उद-दौला” के ख़िताब से नवाज़ा। यह सिर्फ़ एक सम्मान नहीं, बल्कि उस दौर की अदबी दुनिया की तरफ़ से उन्हें सलाम था।
आख़िरी दिन और दिल्ली की ख़ामोश फ़िज़ा
ग़ालिब के आख़िरी दिन बीमारी और आर्थिक तंगी में गुज़रे। मगर इस मुश्किल दौर में भी उनका ज़ेहन और ज़बान ज़िंदा रहे। उनके शागिर्द मीर मेहदी ‘मजरूह’ अक्सर उनसे मिलने जाया करते थे। बीमारी की शिद्दत के बावजूद ग़ालिब का मिज़ाहिया अंदाज़ बरक़रार रहता।
जब किसी ने कहा कि “इंशा-अल्लाह, यह तारीख़ भी ग़लत साबित होगी”, तो ग़ालिब ने अपने ख़ास अंदाज़ में जवाब दिया—
“देखो औल-फ़ौल न बको। ये तारीख़ ग़लत हुई तो मैं सर फोड़ कर मर जाऊँगा।”
और महफ़िल ठहाकों से गूंज उठी।
यह वही ग़ालिब थे, जो ग़म में भी मुस्कुराने का हुनर जानते थे।
15 फ़रवरी 1869 को दिल्ली दरवाज़े के बाहर उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की गई। उन्हें सुल्तान जी मेहबूब-ए-इलाही के क़रीब, चौसठ खंबा के पास, खानदान-ए-लोहारू के क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। आज भी वह मज़ार अदब-परस्तों के लिए अकीदत का मरकज़ है।
उनकी मज़ार पर मीर मेहदी ‘मजरूह’ का यह क़तअ दर्ज है—
या हय्यो या कय्यूम
रशके उर्फ़ी ओ फ़ख्रे-तालिब मुर्द
असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब मुर्द
कल मैं ग़मो-अंदोह में बाख़ातिरे-महजूँ
था तुर्बते उस्ताद पे बैठा हुआ गमनाक
देखा जो मुझे फ़िक्र में तारीख़ की ‘मजरूह’
हातिफ़ ने कहा गंजे-मआनी है तहे-ख़ाक
यह अशआर इस बात की गवाही देते हैं कि ग़ालिब सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि “गंजे-मआनी” — मानी का ख़ज़ाना थे।
ग़ालिब की विरासत
ग़ालिब ने शायरी को महज़ जज़्बाती इज़हार से निकालकर बौद्धिक गहराई दी। उन्होंने इंसानी ज़िंदगी के सवालों—क़िस्मत, वजूद, इश्क़, खुदा और तन्हाई—को शेरों में ढाला। उनका मशहूर शेर आज भी हर दौर की आवाज़ बनकर गूंजता है—
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।
ग़ालिब की शख़्सियत और फ़न यह साबित करते हैं कि अदब वक़्त की क़ैद से आज़ाद होता है। वह 19वीं सदी के शायर थे, मगर 21वीं सदी में भी उतने ही ज़िंदा हैं।
लेखक परिचय
मौहम्मद इल्यास “दनकौरी”
वरिष्ठ स्वतंत्र लेखक, सामाजिक विश्लेषक एवं सांस्कृतिक विषयों के अध्येता। इतिहास, साहित्य, सामाजिक सरोकारों और समकालीन विषयों पर आपकी लेखनी निरंतर सक्रिय है। विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और डिजिटल मंचों पर आपके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। आप विशेष रूप से भारतीय इतिहास, उर्दू-अदब और सामाजिक सौहार्द के विषयों पर शोधपरक एवं संवेदनशील लेखन के लिए जाने जाते हैं।
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मिर्ज़ा ग़ालिब की बरसी पर उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत —
अदब का यह आफ़्ताब कभी ग़ुरूब नहीं होता।