14 फ़रवरी: वैलेंटाइन डे या “बाबर डे” — इतिहास के आईने में एक शख्सियत की कहानी


मौहम्मद इल्यास “दनकौरी”
14 फ़रवरी को जहां पूरी दुनिया प्रेम और भावनाओं के प्रतीक वैलेंटाइन डे के रूप में मनाती है, वहीं इतिहास के पन्नों में यह दिन एक और महत्वपूर्ण घटना का साक्षी है। मध्य एशिया के फरगना (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में 14 फ़रवरी 1483 को ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का जन्म हुआ था — वह शख्सियत जिसने आगे चलकर भारतीय उपमहाद्वीप में मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी।
कुछ क्षेत्रों में इस दिन को बाबर की पैदाइश के रूप में याद किया जाता है। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि “बाबर डे” कोई आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक चर्चा और सामाजिक विमर्श का हिस्सा है।
बाल्यावस्था में सत्ता का भार
बाबर का जीवन संघर्ष और महत्वाकांक्षा की एक अनोखी दास्तान है। जब वह महज 12 वर्ष के थे, तभी उनके पिता उमर शेख मिर्ज़ा, जो फरगना के शासक थे, का निधन हो गया। इतनी कम उम्र में बाबर को फरगना की गद्दी संभालनी पड़ी। एक किशोर के कंधों पर शासन का भार आना अपने आप में असाधारण था।
कम उम्र के बावजूद बाबर की राजनीतिक समझ और दूरदृष्टि उल्लेखनीय थी। वह अपने पूर्वज अमीर तैमूर (तैमूरलंग) की तरह एक विशाल और शक्तिशाली सल्तनत कायम करने का सपना देखते थे।
समरकंद: अधूरी ख्वाहिश की कहानी
सिर्फ 14 वर्ष की उम्र में बाबर ने ऐतिहासिक नगरी समरकंद को जीत लिया। यह वही समरकंद था जो तैमूरी साम्राज्य की गौरवशाली राजधानी रहा था। बाबर ने फरगना और समरकंद को जोड़कर एक मजबूत सत्ता स्थापित करने की कोशिश की।
लेकिन सियासत का खेल बेरहम होता है। फरगना में विद्रोह हो गया और उनके छोटे भाई जहांगीर मिर्ज़ा को गद्दी पर बैठा दिया गया। बाबर जब फरगना वापस लेने निकले तो समरकंद में उनकी फौज ने साथ छोड़ दिया। परिणामस्वरूप, उनके हाथ से दोनों राज्य निकल गए।
यह दौर बाबर के जीवन का सबसे कठिन समय था। वह बदख्शां और ताजिकिस्तान के पहाड़ी इलाकों में अपने वफादार साथियों के साथ भटकते रहे। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दो वर्षों की कठिन तैयारी के बाद 1501 में उन्होंने दोबारा समरकंद पर अधिकार किया। हालांकि यह सफलता भी स्थायी नहीं रही।
उस समय मध्य एशिया की राजनीति बदल चुकी थी। उज़्बेक सरदार शैबानी खान का प्रभाव बढ़ चुका था। शैबानी खान ने पहले समरकंद और फिर फरगना पर कब्जा कर लिया। बाबर को एक बार फिर बेघर होना पड़ा।
काबुल की ओर रुख और नई शुरुआत
लगातार संघर्षों के बाद 1504 में बाबर ने हिंदूकुश की बर्फीली चोटियों को पार कर बल्ख और काबुल पर अधिकार कर लिया। काबुल उनके लिए एक स्थायी आधार बना, जहां से उन्होंने अपनी ताकत को संगठित किया और भविष्य की योजनाएँ तैयार कीं।
हिंदुस्तान की सियासत और बाबर का आगमन
उधर हिंदुस्तान में भी राजनीतिक उथल-पुथल जारी थी। दिल्ली पर इब्राहिम लोदी का शासन था, लेकिन उनके विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा था। पंजाब के सूबेदार दौलत खान लोदी, इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खान लोदी और मेवाड़ के शासक राणा सांगा — ये सभी इब्राहिम लोदी से असंतुष्ट थे।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इन शक्तियों ने बाबर को भारत पर आक्रमण का निमंत्रण दिया। बाबर पहले से ही मध्य एशिया में असफलताओं के बाद नए अवसर की तलाश में थे। उन्होंने हिंदुस्तान की राजनीतिक स्थिति का आकलन किया और एक सुव्यवस्थित सेना के साथ भारत की ओर कूच किया।
पानीपत से मुग़ल सल्तनत तक
21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। बाबर की सेना संख्या में कम थी, लेकिन उसने आधुनिक तोपखाने और युद्धनीति का प्रभावी उपयोग किया। इब्राहिम लोदी की हार के साथ दिल्ली की सल्तनत का अंत हुआ और भारत में मुग़ल साम्राज्य की नींव पड़ी।
इसके बाद बाबर ने 1527 में खानवा के युद्ध में राणा सांगा को पराजित किया और अपनी स्थिति को और मजबूत किया। बाबर जो कुछ समरकंद और फरगना में स्थायी रूप से स्थापित नहीं कर सके थे, वह उन्होंने हिंदुस्तान में कर दिखाया।
इतिहास का बहुआयामी चरित्र
बाबर का व्यक्तित्व केवल एक विजेता तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपनी आत्मकथा “बाबरनामा” लिखी, जो तुर्की भाषा में रचित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष, प्रकृति प्रेम, प्रशासनिक दृष्टिकोण और भावनात्मक अनुभवों का उल्लेख किया है।
इतिहास में बाबर की छवि अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखी जाती है—किसी के लिए वह एक विजेता और साम्राज्य निर्माता हैं, तो किसी के लिए एक आक्रमणकारी। लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने भारतीय इतिहास की दिशा को बदल दिया।
लेखक परिचय
मौहम्मद इल्यास “दनकौरी”
मौहम्मद इल्यास “दनकौरी” सामाजिक, ऐतिहासिक और समसामयिक विषयों पर लेखन के लिए जाने जाते हैं। जमीनी मुद्दों, ऐतिहासिक घटनाओं और जनभावनाओं को संतुलित दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की विशेषता है। विभिन्न सामाजिक आयोजनों, सांस्कृतिक गतिविधियों और ऐतिहासिक विश्लेषणों पर उनकी रिपोर्टिंग पाठकों के बीच सराही जाती रही है।
कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख ऐतिहासिक स्रोतों और उपलब्ध प्रचलित विवरणों के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत अध्ययन और विश्लेषण पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म या समूह की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं का तथ्यात्मक और शैक्षिक प्रस्तुतीकरण करना है।
इतिहास बहुआयामी होता है और विभिन्न स्रोतों में घटनाओं का वर्णन भिन्न रूप में मिल सकता है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस लेख को ऐतिहासिक विमर्श के रूप में देखें।

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