सामाजिक बदलाव की मिसाल “एक रुपया, एक संकल्प और एक संदेश” — ग्रेटर नोएडा से दहेज मुक्त विवाह की ऐतिहासिक पहल

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“एक रुपया, एक संकल्प और एक संदेश” — ग्रेटर नोएडा से दहेज मुक्त विवाह की ऐतिहासिक पहल


मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी”/ ग्रेटर नोएडा
भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का मिलन माना जाता है। लेकिन समय के साथ कई सामाजिक कुरीतियों ने इस पवित्र बंधन को आर्थिक लेन-देन का माध्यम बना दिया। दहेज प्रथा आज भी अनेक परिवारों के लिए मानसिक, सामाजिक और आर्थिक बोझ बनी हुई है। ऐसे दौर में ग्रेटर नोएडा के साकीपुर गांव से एक ऐसी सकारात्मक खबर सामने आई है, जिसने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के जिलाध्यक्ष जितेंद्र भाटी ने अपने पुत्र अनिकेत भाटी के विवाह को पूरी तरह दहेज मुक्त बनाकर एक सशक्त सामाजिक संदेश दिया है। अनिकेत का विवाह दिल्ली के बिहारीपुर निवासी प्रवीण की सुपुत्री निखिता के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ, लेकिन इस विवाह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी और दहेज के पूर्ण बहिष्कार में रही।
केवल 1 रुपया — परंपरा भी, संदेश भी
विवाह के लगन और सगाई समारोह में जहां आमतौर पर महंगे उपहार, आभूषण और नकद राशि का लेन-देन होता है, वहां जितेंद्र भाटी ने साफ शब्दों में दहेज लेने से इनकार कर दिया। प्रतीकात्मक रूप से केवल 1 रुपये का टीका स्वीकार किया गया।
विदाई के समय भी कन्या पक्ष से किसी प्रकार का सामान, गाड़ी, फर्नीचर या नकद राशि नहीं ली गई। केवल 1 रुपये का कन्यादान लेकर इस रिश्ते को सम्मान, समानता और आत्मसम्मान के आधार पर स्थापित किया गया।
यह 1 रुपया केवल शगुन नहीं था — यह दहेज प्रथा के खिलाफ एक सार्वजनिक घोषणा थी।
राजनीतिक पद से आगे बढ़कर सामाजिक जिम्मेदारी
आमतौर पर जनप्रतिनिधियों के परिवारों की शादियां भव्यता और भीड़ के लिए जानी जाती हैं, लेकिन इस विवाह ने दिखाया कि नेतृत्व केवल मंच से भाषण देने तक सीमित नहीं होता।
जितेंद्र भाटी ने यह साबित किया कि यदि सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोग स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें, तो समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव है। उनका यह निर्णय निजी नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकार से जुड़ा हुआ कदम माना जा रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने इसे “दहेज के खिलाफ जमीनी क्रांति” बताया है।
सादगीपूर्ण बारात — बिना डीजे, बिना दिखावे
आजकल शादियों में डीजे, आतिशबाजी और महंगे आयोजन प्रतिष्ठा का प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इस विवाह में बारात सादगी से निकाली गई।
न डीजे का शोर, न फिजूलखर्ची — केवल पारंपरिक रीति-रिवाज और पारिवारिक सौहार्द।
यह संदेश स्पष्ट था —
विवाह संस्कार है, प्रदर्शन नहीं।
समाज पर संभावित प्रभाव
दहेज निषेध अधिनियम 1961 के बावजूद, दहेज प्रथा कई रूपों में आज भी मौजूद है। अक्सर इसे “उपहार” या “सहयोग” के नाम पर वैध ठहराया जाता है।
ऐसे में जब एक सार्वजनिक जीवन से जुड़ा परिवार खुलकर दहेज का त्याग करता है, तो इसका प्रभाव व्यापक होता है।
युवाओं में जागरूकता बढ़ती है
कन्या पक्ष का मानसिक दबाव कम होता है
सामाजिक प्रतिष्ठा का नया मानदंड स्थापित होता है
कई स्थानीय परिवारों ने भी भविष्य में दहेज मुक्त विवाह करने की बात कही है।
युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत
इस विवाह ने युवाओं के सामने एक नई सोच प्रस्तुत की है —
जीवनसाथी का चयन उसके संस्कार, शिक्षा और व्यक्तित्व के आधार पर होना चाहिए, न कि आर्थिक क्षमता पर।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि यदि शिक्षित और जागरूक युवा दहेज लेने से इनकार कर दें, तो यह प्रथा स्वतः समाप्त हो सकती है। इस पहल ने यही संकेत दिया है।
भावनात्मक पक्ष: बेटी सम्मान है, बोझ नहीं
दहेज प्रथा का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि बेटियों को कई परिवार आर्थिक बोझ के रूप में देखने लगते हैं।
ऐसे में इस विवाह ने यह संदेश दिया कि बेटी सम्मान है, जिम्मेदारी नहीं।
कन्या पक्ष के परिजनों ने भी इस निर्णय पर संतोष व्यक्त किया और इसे “सम्मानजनक और आत्मसम्मान से भरा रिश्ता” बताया।
क्या यह नई सामाजिक लहर की शुरुआत है?
ग्रेटर नोएडा के इस विवाह ने एक सवाल खड़ा किया है —
क्या अब समाज दिखावे से हटकर सादगी की ओर लौटेगा?
क्या प्रभावशाली परिवारों की ऐसी पहल दहेज प्रथा के अंत की शुरुआत बन सकती है?
समाज के जागरूक वर्ग का मानना है कि परिवर्तन की शुरुआत हमेशा छोटे कदम से होती है — और यहां वह कदम था केवल 1 रुपया।
✦ “विजन लाइव” का विश्लेषण
यह विवाह केवल एक पारिवारिक समारोह नहीं था, बल्कि सामाजिक चेतना का संदेश था।
यह साबित करता है कि
“बदलाव कानून से नहीं, संकल्प से आता है।”
ग्रेटर नोएडा की यह पहल आने वाले समय में दहेज मुक्त समाज की दिशा में प्रेरणादायक अध्याय बन सकती है।

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