यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन में 27 वर्षीय युवक को मिला दूसरा जीवन; ट्रॉमा-रेडी सिस्टम और टीमवर्क की मिसाल

मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी”/ नोएडा एक्सटेंशन
पेड़ की ऊंचाई पर चलती चेनसॉ, एक पल की फिसलन और अगले ही सेकंड भयावह दृश्य—पेट की दीवार चीरती मशीन, बाहर निकली छोटी आंत और तेज़ रक्तस्राव। 27 वर्षीय युवक के साथ हुआ यह हादसा कुछ ही मिनटों में जानलेवा बन सकता था। लेकिन ‘गोल्डन आवर’ में मिली विशेषज्ञ चिकित्सा, ट्रॉमा-रेडी इमरजेंसी और सर्जिकल सटीकता ने असंभव प्रतीत हो रही स्थिति को जीवनदान में बदल दिया।
हादसे से अस्पताल तक: हर मिनट कीमती
युवक पेड़ की डालियां काट रहा था। संतुलन बिगड़ते ही चेनसॉ पेट से टकराई।
एब्डॉमिनल वॉल पूरी तरह क्षतिग्रस्त
छोटी आंत का बड़ा हिस्सा बाहर
भारी रक्तस्राव और सेप्सिस का उच्च जोखिम
मौके पर मौजूद लोगों ने प्राथमिक रूप से साफ कपड़े से घाव को ढककर तुरंत अस्पताल पहुंचाया—यह त्वरित प्रतिक्रिया निर्णायक साबित हुई।
इमरजेंसी प्रोटोकॉल: ‘एटीएलएस’ के तहत त्वरित आकलन
अस्पताल पहुंचते ही ट्रॉमा टीम ने एयरवे, ब्रीदिंग, सर्कुलेशन (ABC) का आकलन किया।
शॉक की आशंका के चलते फ्लूड रेससिटेशन
रक्त जांच और क्रॉस-मैच
ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स की शुरुआत
तत्काल ऑपरेशन थिएटर की तैयारी
डॉक्टरों ने स्पष्ट किया—देरी का अर्थ होता व्यापक संक्रमण, मल्टी-ऑर्गन फेल्योर या अनियंत्रित रक्तस्राव।
ऑपरेशन थिएटर: तीन घंटे की जटिल जंग
सर्जरी के दौरान सामने आई चुनौतियां—
छोटी आंत तीन स्थानों से फटी हुई
मेसेन्ट्री (रक्त आपूर्ति की झिल्ली) में गहरे चीरे
निरंतर रक्तस्राव
टीम ने क्षतिग्रस्त हिस्से को हटाकर रिसेक्शन एवं एनास्टोमोसिस (आंत को दोबारा जोड़ना) किया। मेसेन्ट्री की मरम्मत कर रक्त प्रवाह बहाल किया गया। पेट की परतों को क्रमवार पुनर्स्थापित किया गया और संक्रमण रोकने के लिए व्यापक एंटीसेप्टिक प्रोटोकॉल अपनाया गया।
पूरी सर्जरी लगभग तीन घंटे चली—जहां हर निर्णय सेकंडों में लिया गया।
डॉ. कपिल कोचर, निदेशक (मिनिमल एक्सेस, बैरिएट्रिक, रोबोटिक एवं जनरल सर्जरी), ने कहा—
“ओपन एब्डॉमिनल ट्रॉमा में सबसे बड़ा खतरा अनियंत्रित रक्तस्राव और सेप्सिस का होता है। हमारी प्राथमिकता रक्त प्रवाह को स्थिर करना, संक्रमण रोकना और आंत की निरंतरता बहाल करना थी। टीमवर्क और समयबद्ध निर्णय ही सफलता की कुंजी रहे।”
पोस्ट-ऑप केयर: रिकवरी की विज्ञान-आधारित रणनीति
पहले 24 घंटे सर्जिकल आईसीयू में कड़ी निगरानी
48 घंटे में हेमोडायनामिक स्थिरता
चरणबद्ध पोषण (IV फ्लूड → लिक्विड डाइट → सॉफ्ट डाइट)
संक्रमण की सतत मॉनिटरिंग
फिजियोथेरेपी और अर्ली मोबिलाइजेशन
नौवें दिन मरीज बिना व्हीलचेयर, अपने पैरों पर घर लौटा—यह न केवल सर्जरी, बल्कि सटीक पोस्ट-ऑप प्रबंधन की भी जीत थी।
विशेष एंगल: ट्रॉमा-रेडी हेल्थकेयर बनाम हादसों की हकीकत
यह केस केवल एक सफल ऑपरेशन नहीं, बल्कि शहरी-ग्रामीण सीमाओं पर काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा संस्कृति पर भी प्रश्न उठाता है। चेनसॉ जैसे उपकरणों के उपयोग में—
सेफ्टी हार्नेस
कट-रेसिस्टेंट जैकेट/एप्रन
फेस शील्ड और ग्लव्स
प्रोफेशनल ट्रेनिंग
का अभाव अक्सर गंभीर हादसों को जन्म देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में निर्माण और वृक्ष-छंटाई कार्यों में सुरक्षा मानकों का अनुपालन सख्ती से सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
साथ ही, यह घटना बताती है कि ट्रॉमा-रेडी अस्पताल, 24×7 सर्जिकल टीम और आईसीयू सपोर्ट जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी को कम कर सकते हैं।
चिकित्सकीय दृष्टि से क्यों था मामला ‘हाई-रिस्क’?
खुले पेट की चोट में फीकल कंटैमिनेशन का खतरा
6–8 घंटे के भीतर संक्रमण का तीव्र प्रसार
रक्तस्राव से शॉक
देरी होने पर सेप्टिक शॉक और मल्टी-ऑर्गन फेल्योर
समय पर हस्तक्षेप ने इन सभी संभावित जटिलताओं को टाल दिया।

संदेश: सुरक्षा और सतर्कता ही पहली ढाल
यह घटना जहां आधुनिक चिकित्सा की क्षमता का प्रमाण है, वहीं आमजन के लिए चेतावनी भी—
जोखिम भरे उपकरणों के उपयोग में एक छोटी लापरवाही जीवन बदल सकती है।
नोएडा एक्सटेंशन की यह कहानी बताती है—
गोल्डन आवर में सही इलाज, अनुभवी सर्जन और सुसज्जित ट्रॉमा सिस्टम—असंभव को संभव बना सकते हैं।