
मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी” / नई दिल्ली
दिल्ली के सांस्कृतिक हृदय—मंडी हाउस—में स्थित त्रिवेणी कला संगम इन दिनों अपनी 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक भव्य “हेरिटेज महोत्सव” का आयोजन कर रहा है। कनॉट प्लेस के किराए के दो छोटे कमरों से शुरू हुई यह संस्था आज भारतीय कला जगत की एक सशक्त और सम्मानित पहचान बन चुकी है। 27 फरवरी से 15 मार्च 2026 तक चलने वाला यह महोत्सव केवल एक औपचारिक समारोह नहीं, बल्कि भारतीय कला, संवाद और सांस्कृतिक साझेदारी की 75 वर्षों की निरंतर यात्रा का सार्वजनिक उत्सव है।
संस्थापक की दूरदृष्टि से आकार लेता सपना
त्रिवेणी कला संगम की स्थापना 1950 में स्वर्गीय श्रीमती सुंदरी के. श्रीधरानी ने की थी। कराची में बचपन से ही उन्हें संगीत और लय से विशेष लगाव था। उनका सपना था कि एक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किया जाए, जहां कला किसी वर्ग या दायरे में सीमित न हो, बल्कि खुलकर सांस ले सके।
उनकी परिकल्पना में त्रिवेणी केवल एक कला विद्यालय नहीं, बल्कि एक जीवंत मंच था—जहां चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और रंगमंच एक-दूसरे के साथ संवाद करें। यही समन्वय आज भी त्रिवेणी की पहचान है।
1960 में प्रसिद्ध अमेरिकी वास्तुकार जोसेफ एलन स्टीन ने त्रिवेणी के आधुनिक परिसर का डिजाइन तैयार किया। खुले आंगन, प्राकृतिक रोशनी, सादगीपूर्ण निर्माण और आपस में जुड़े गैलरी व स्टूडियो इस परिसर को एक अनूठा सांस्कृतिक अनुभव बनाते हैं। यहां कला केवल दीवारों पर टंगी नहीं रहती, बल्कि वातावरण में महसूस होती है।

‘फ्रॉम टू रूम्स… टू अ लैंडमार्क’—एक ऐतिहासिक दस्तावेज
महोत्सव की केंद्रीय प्रदर्शनी ‘फ्रॉम टू रूम्स… टू अ लैंडमार्क’ त्रिवेणी की यात्रा को दृश्य रूप में सामने लाती है।
इसमें संस्था के शुरुआती दिनों के दुर्लभ फोटोग्राफ, पत्राचार, आमंत्रण पत्र, पुराने कार्यक्रमों की झलकियां और कई ऐतिहासिक दस्तावेज शामिल हैं।
यह प्रदर्शनी दर्शाती है कि आजादी के बाद के दौर में जब देश अपनी सांस्कृतिक पहचान गढ़ रहा था, तब त्रिवेणी ने किस प्रकार एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक कला मंच के रूप में अपनी जगह बनाई।
संवाद और विचारों का संगम
महोत्सव के अंतर्गत कई विशेष चर्चा सत्र और प्रस्तुतियां आयोजित की जा रही हैं—
‘द इम्पॉर्टेंस ऑफ बीइंग त्रिवेणी’: इस थिएटर चर्चा में प्रसिद्ध रंग निर्देशक और शिक्षक फैसल अलकाज़ी, वरिष्ठ पत्रकार मंदीरा नायर के साथ संवाद करेंगे।
‘वर्किंग विद स्टीन – द इनसाइड स्टोरी’: इस सत्र में आर्किटेक्ट सुधीश मोहिंद्रू और मीना मणि, जोसेफ एलन स्टीन के साथ काम करने के अनुभव साझा करेंगे और बताएंगे कि किस तरह त्रिवेणी जैसे संस्थानों का स्थापत्य स्वयं एक सांस्कृतिक वक्तव्य बन जाता है।
इन चर्चाओं का उद्देश्य केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक दिशा पर विचार करना भी है।
जब ‘टी टेरेस’ बना सांस्कृतिक संवाद का प्रतीक
त्रिवेणी का कैफे—1960 के दशक की प्रसिद्ध ‘टी टेरेस’—दिल्ली के रचनात्मक जीवन का केंद्र रहा है। यहां कलाकार, लेखक, छात्र और बुद्धिजीवी घंटों बैठकर कला, साहित्य और समाज पर चर्चा करते थे।
इसी परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए 23 फरवरी से 15 मार्च तक सीमित अवधि के लिए ‘हेरिटेज मेन्यू’ शुरू किया गया है।
यह वही स्थान है जहां आधुनिक भारतीय कला के दिग्गज—एम.एफ. हुसैन, किशन खन्ना, विवान सुंदरम, रघु राय और तैयब मेहता—बैठकों का हिस्सा रहे।
नृत्य जगत से बिरजू महाराज, यामिनी कृष्णमूर्ति, इंद्राणी रहमान;
संगीत से पंडित रवि शंकर, पंडित जसराज और हरि प्रसाद चौरसिया;
और रंगमंच से इब्राहिम अलकाजी, हबीब तनवीर तथा नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार यहां के खुले माहौल का हिस्सा रहे।
यह कैफे केवल भोजन स्थल नहीं, बल्कि विचारों का लोकतांत्रिक मंच था—जहां स्थापित और उभरते कलाकार एक ही मेज पर बैठते थे।
सिद्धांतों पर कायम संस्था
पिछले 75 वर्षों में त्रिवेणी ने कला को व्यवसाय नहीं बनने दिया।
यह एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में हमेशा खुला सांस्कृतिक परिसर रही है। यहां प्रवेश और भागीदारी में किसी प्रकार का वर्गभेद या विशेषाधिकार नहीं रहा।
संस्था के मानद महासचिव अमर श्रीधरानी के अनुसार,
“75 वर्षों की यह यात्रा निरंतर मेहनत और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम है। आने वाले वर्षों में भी त्रिवेणी कला की स्वतंत्रता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और भारतीय शास्त्रीय परंपराओं के संरक्षण के लिए समर्पित रहेगी। साथ ही डिजिटल रिकॉर्ड, नई तकनीक और अंतर-विषयक सहयोग के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाने की योजना है।”
आधुनिक कला के निर्माण में योगदान
त्रिवेणी ने केवल मंच ही नहीं दिया, बल्कि कला शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाने का काम भी किया। यहां हजारों विद्यार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया और आगे चलकर कला जगत में अपनी पहचान बनाई।
ओडिसी गुरु केलुचरण महापात्र, उदय शंकर, हबीब तनवीर, इब्राहिम अलकाजी जैसे दिग्गजों की उपस्थिति ने इसे कला के संगम स्थल के रूप में स्थापित किया।
त्रिवेणी ने समय-समय पर बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में भी अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी—जो इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है।
भविष्य की ओर बढ़ता कदम
अब जब त्रिवेणी अपने अगले 25 वर्षों की ओर बढ़ रही है, तब उसका उद्देश्य केवल परंपरा को दोहराना नहीं, बल्कि उसे नए संदर्भों में आगे बढ़ाना है।
नई पीढ़ी के कलाकारों को मंच देना, डिजिटल माध्यमों से कला का दस्तावेजीकरण करना, और विविध कला विधाओं के बीच सहयोग बढ़ाना—ये सभी योजनाएं संस्था की आगामी दिशा को दर्शाती हैं।

एक विरासत, जो जीवित है
त्रिवेणी कला संगम का 75वां वर्ष केवल एक संस्था का जश्न नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना की निरंतरता का प्रतीक है।
यह वह स्थान है जहां कला दीवारों में सीमित नहीं, बल्कि लोगों के बीच सांस लेती है।
त्रिवेणी@75 हेरिटेज फेस्टिवल 15 मार्च 2026 तक आम जनता के लिए खुला है।
यह महोत्सव हमें याद दिलाता है कि जब कला स्वतंत्र और समावेशी होती है, तब वह केवल प्रदर्शन नहीं रहती—वह समाज की आत्मा बन जाती है।