सेप्सिस से संग्राम: 10 दिन वेंटिलेटर पर रहा 9 वर्षीय बच्चा, मल्टीडिसीप्लीनरी टीम ने दी नई जिंदगी

🔴 स्पेशल स्टोरी | सेप्सिस से संग्राम: 10 दिन वेंटिलेटर पर रहा 9 वर्षीय बच्चा, मल्टीडिसीप्लीनरी टीम ने दी नई जिंदगी


मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी”/ ग्रेटर नोएडा
यह सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं, बल्कि समय के खिलाफ लड़ी गई जंग की कहानी है। एक 9 वर्षीय बच्चा—जो लगातार बुखार, कूल्हे में सूजन और चलने में असमर्थता से जूझ रहा था—कुछ ही दिनों में गंभीर सेप्टिक शॉक की स्थिति में पहुंच गया। 10 दिनों से अधिक समय तक वेंटिलेटर पर रही उसकी हर सांस, डॉक्टरों और क्रिटिकल केयर टीम की सतर्क निगरानी में चल रही थी। अंततः समन्वित प्रयासों ने इस जंग को जीत में बदल दिया।


🦴 साधारण दर्द से जानलेवा संक्रमण तक
बच्चे को लगभग एक सप्ताह से तेज बुखार और दाएं कूल्हे में दर्द था। परिवार ने प्रारंभिक इलाज कराया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। जब उसे फोर्टिस हॉस्पीटल ग्रेटर नोएडा लाया गया, तब तक उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं, पल्स कमजोर पड़ रही थी, ब्लड प्रेशर गिरने की कगार पर था और पेशाब की मात्रा कम हो चुकी थी—ये सभी संकेत गंभीर सेप्टिक शॉक के थे।
विस्तृत जांच में दाएं कूल्हे में ऑस्टियोमायलिटिस (बोन इंफेक्शन) और जोड़ में भारी मात्रा में मवाद की पुष्टि हुई। संक्रमण तेजी से फैल चुका था और तत्काल सर्जिकल हस्तक्षेप के बिना जान बचाना मुश्किल था।
⚠️ निर्णायक सर्जरी और 200 मिली मवाद
ऑर्थोपेडिक, पिडियाट्रिक, एनेस्थीसिया और इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी टीमों ने बिना समय गंवाए इमरजेंसी सर्जरी की। ऑपरेशन के दौरान कूल्हे के जोड़ से लगभग 200 मिली मवाद निकाला गया।


डॉ भरत गोस्वामी, कंसल्टेंट ऑर्थोपिडिक्स, ने बताया:
“जब हमने जोड़ को खोला, तो संक्रमण की आक्रामकता साफ दिखाई दे रही थी। इतनी मात्रा में मवाद यह संकेत देती है कि संक्रमण कई दिनों से अनियंत्रित था। यदि थोड़ी भी देरी होती, तो जोड़ को स्थायी नुकसान या संक्रमण के पूरे शरीर में फैलने का खतरा था। तत्काल ड्रेनेज और डिब्राइडमेंट ने बच्चे के जोड़ को बचाने में अहम भूमिका निभाई।”
🏥 10 दिन वेंटिलेटर पर—क्रिटिकल केयर की असली परीक्षा
सर्जरी के बाद भी खतरा टला नहीं था। बच्चे को पेडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (PICU) में स्थानांतरित किया गया। उसकी हालत नाजुक थी—फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित, ब्लड प्रेशर अस्थिर और अंगों पर संक्रमण का असर।


डॉ कुशाग्र गुप्ता, कंसल्टेंट – पिडियाट्रिक्स, ने कहा:
“बच्चों में बोन इंफेक्शन बहुत तेजी से सेप्सिस में बदल सकता है। इस केस में संक्रमण पहले ही सिस्टमेटिक हो चुका था। हमें वेंटिलेटर सपोर्ट, इंटेंसिव एंटीबायोटिक थेरेपी और ऑर्गन सपोर्ट के जरिए मल्टी-ऑर्गन फेल्योर की संभावना को रोकना था। पहले 72 घंटे बेहद चुनौतीपूर्ण थे, लेकिन टीम की निरंतर मॉनिटरिंग और त्वरित निर्णयों से स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रित हुई।”
लगातार 10 दिनों तक वेंटिलेटर सपोर्ट और 24×7 निगरानी के बाद संक्रमण पर नियंत्रण पाया गया। धीरे-धीरे फेफड़ों और हृदय की कार्यप्रणाली स्थिर हुई और बच्चे को वेंटिलेटर से हटाया गया।
🤝 मल्टीडिसीप्लीनरी तालमेल—सफलता की असली कुंजी
इस जटिल केस में सिर्फ सर्जरी या दवाएं ही नहीं, बल्कि टीमवर्क निर्णायक साबित हुआ। ऑर्थोपेडिक्स, पिडियाट्रिक्स, एनेस्थीसियोलॉजी, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी और क्रिटिकल केयर—सभी विभागों ने एक साझा रणनीति के तहत काम किया।


सिद्धार्थ निगम, फेसिलिटी डायरेक्टर, फोर्टिस हॉस्पीटल ग्रेटर नोएडा, ने कहा:
“जब कोई बच्चा तेजी से बिगड़ती स्थिति में हमारे पास आता है, तो हमारी प्राथमिकता ‘गोल्डन आवर रिस्पॉन्स’ होती है। इस केस में क्लीनिकल एक्सपर्टीज के साथ-साथ एडवांस क्रिटिकल केयर इंफ्रास्ट्रक्चर और टीमों के बीच रियल-टाइम कोऑर्डिनेशन ने फर्क पैदा किया। 10 दिनों तक वेंटिलेटर पर रहे बच्चे की रिकवरी इस बात का प्रमाण है कि समर्पण, तकनीक और टीमवर्क मिलकर असंभव को संभव बना सकते हैं।”


📌 चेतावनी और संदेश
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में हड्डियों का संक्रमण (ऑस्टियोमायलिटिस) या सेप्टिक आर्थराइटिस को कभी भी सामान्य बुखार या दर्द समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
समय पर पहचान और त्वरित उपचार से न केवल जान बचाई जा सकती है, बल्कि स्थायी विकलांगता से भी बचाव संभव है।


🌟 जिंदगी की वापसी
इलाज और गहन देखभाल के बाद बच्चा अब सुरक्षित घर लौट चुका है। उसे एंटी-ट्यूबरक्युलर थेरेपी (ATT), एंटीबायोटिक्स और नियमित फॉलो-अप की सलाह दी गई है। धीरे-धीरे वह सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है।
यह कहानी सिर्फ एक बच्चे की रिकवरी नहीं, बल्कि यह विश्वास दिलाती है कि सही समय पर सही फैसले और मजबूत टीमवर्क—जिंदगी की बाजी पलट सकते हैं।

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