
मौहम्मद इल्यास- “दनकौरी” /स्पेशल न्यूज़ स्टोरी | हेल्थ अलर्ट
कैंसर की बदलती उम्र: 20–30 की दहलीज़ पर खड़ा मौत का खतरा, लेकिन समय पर इलाज से लौट रही ज़िंदगी
ग्रेटर नोएडा | 4 फरवरी 2026 | विश्व कैंसर दिवस
कैंसर—जिसे अब तक उम्र के आख़िरी पड़ाव की बीमारी माना जाता रहा—अब चुपचाप युवाओं की ज़िंदगी में दस्तक दे रहा है। बदलती जीवनशैली, पर्यावरणीय कारण, तनाव, अनियमित खानपान और जागरूकता की कमी ने इस बीमारी की उम्र-सीमा को तोड़ दिया है।
आज हालात यह हैं कि 20 से 30 वर्ष की उम्र में भी युवा जानलेवा कैंसर से जूझते हुए अस्पतालों तक पहुँच रहे हैं—वह भी तब, जब बीमारी अक्सर एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी होती है।
विश्व कैंसर दिवस के अवसर पर फोर्टिस हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा ने इसी गंभीर सच्चाई को सामने लाते हुए न सिर्फ़ मेडिकल डेटा साझा किया, बल्कि दो ऐसे युवाओं की असल ज़िंदगी की कहानियाँ भी मीडिया के सामने रखीं, जिन्होंने मौत के बेहद करीब पहुंचकर भी कैंसर को मात दी।

युवाओं में बढ़ते कैंसर: आंकड़े डराते हैं
JAMA नेटवर्क ओपन में प्रकाशित हालिया अध्ययन के अनुसार,
👉 50 वर्ष से कम उम्र के लोगों में कैंसर की दर अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है।
👉 ब्लड कैंसर, लिंफोमा और कुछ ठोस ट्यूमर अब युवाओं में अधिक देखे जा रहे हैं।
👉 शुरुआती लक्षण सामान्य होने के कारण 60–70% युवा मरीज देरी से अस्पताल पहुंचते हैं।
यही वजह है कि डॉक्टर इसे एक साइलेंट एपिडेमिक मान रहे हैं।
केस स्टडी–1: मौत से 30% उम्मीद और फिर चमत्कार
20 वर्षीय राहुल: स्टेज-3 कैंसर, लेकिन हौसले ने नहीं मानी हार
लगातार बुखार, गर्दन में सूजन और उल्टी—राहुल और उनके परिवार को शुरुआत में यह एक सामान्य संक्रमण लगा। कई हफ्तों तक घरेलू इलाज चलता रहा। जब हालत बिगड़ने लगी, तब फोर्टिस ग्रेटर नोएडा में जांच कराई गई।
रिपोर्ट ने सभी को झकझोर दिया—
👉 स्टेज-3 हॉजकिन लिंफोमा
👉 जीवित रहने की संभावना 30% से भी कम
डॉक्टरों के मुताबिक, बीमारी काफी फैल चुकी थी। लेकिन बिना समय गंवाए साक्ष्य-आधारित कीमोथेरेपी शुरू की गई। इलाज कठिन था, लेकिन राहुल का शरीर उपचार के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया देता रहा।

कुछ महीनों बाद की गई PET-CT स्कैन रिपोर्ट ने उम्मीद की नई किरण जगा दी—
👉 कैंसर पूरी तरह कंट्रोल में
👉 मरीज रिमिशन की ओर
आज राहुल नियमित फॉलो-अप में हैं और सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। डॉक्टर साफ कहते हैं—
“अगर तीन–चार महीने और देरी होती, तो बचना संभव नहीं था।”
केस स्टडी–2: 24 की उम्र, ब्लड कैंसर और छह महीने की चेतावनी
सुमित कुमार: जब बुखार ने खोली जानलेवा बीमारी की परत
24 वर्षीय सुमित को लगातार बुखार और पेट में बेचैनी रहती थी। आमतौर पर युवा ऐसे लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं—सुमित भी यही कर रहे थे।
लेकिन जब कमजोरी बढ़ी, तब फोर्टिस ग्रेटर नोएडा में जांच कराई गई।
👉 ब्लड काउंट असामान्य
👉 बोन मैरो बायोप्सी में पुष्टि—क्रोनिक माइलॉयड ल्यूकीमिया
डॉक्टरों के अनुसार, इस स्टेज पर इलाज न मिलता तो सुमित की जिंदगी छह महीने से ज्यादा नहीं बचती।
तुरंत शुरू की गई टारगेटेड ओरल थेरेपी ने हालात पलट दिए।
👉 ब्लड काउंट सामान्य
👉 ICU की जरूरत नहीं
👉 धीरे-धीरे रिकवरी
आज सुमित घर पर हैं, नियमित दवाओं और फॉलो-अप के साथ एक सामान्य युवा की तरह जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं।

डॉक्टरों की दो टूक चेतावनी
डॉ. प्रभात रंजन | मेडिकल ऑन्कोलॉजी
“युवाओं में कैंसर बढ़ना एक गंभीर सामाजिक और मेडिकल चुनौती है। बुखार, सूजन, थकान जैसे लक्षणों को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। आज की आधुनिक कीमोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी से कई ब्लड कैंसर पूरी तरह काबू में लाए जा सकते हैं—शर्त सिर्फ़ एक है, समय पर डायग्नॉसिस।”
डॉ. अंबेश सिंह | सर्जिकल ऑन्कोलॉजी
“हम लगातार युवा मरीजों को एडवांस स्टेज में देख रहे हैं। शुरुआती जांच और सही समय पर सर्जरी या इंटीग्रेटेड ट्रीटमेंट से कैंसर को हराया जा सकता है। जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।”

बैंगनी रोशनी और मजबूत संदेश
विश्व कैंसर दिवस पर फोर्टिस हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा को बैंगनी रोशनी में सजाया गया—जो कैंसर जागरूकता का वैश्विक प्रतीक है।
अस्पताल प्रबंधन का स्पष्ट संदेश था—
“डर नहीं, देरी जानलेवा है।”
सिद्धार्थ निगम | फैसिलिटी डायरेक्टर
“हम एडवांस डायग्नॉस्टिक्स, मल्टीडिसीप्लीनरी टीम और मरीज-केंद्रित इलाज के जरिए कैंसर के खिलाफ मजबूती से खड़े हैं। इन दोनों मामलों ने साबित किया है कि सही समय पर सही इलाज ज़िंदगी लौटा सकता है।”

“विजन लाइव “का विश्लेषण: युवा हैं तो अमर नहीं
राहुल और सुमित की कहानियां सिर्फ़ मेडिकल केस नहीं हैं—ये चेतावनी हैं पूरे समाज के लिए।
👉 लगातार बुखार
👉 असामान्य सूजन
👉 बिना वजह थकान
👉 अचानक वजन घटना
इन संकेतों को नजरअंदाज़ करना अब खतरे से खाली नहीं।
कैंसर अब उम्र नहीं देखता—लेकिन समय पर पहचान उसे मात दे सकती है।